तीर्थ के प्रकार, 6 प्रकार के तीर्थ भारतीय हिन्दू सनातन संस्कृति के अनुसार जो मानव जीवन को पूर्णतः सुखद बनाने का और बदल देने का सामर्थ्य रखते है !

types of pilgrimage according to Indian Hindu sanatan culture there are 6 types of pilgrimage which have the ability to make human life completely enjoyable and change

शास्त्रों, संतो, एवं महपुरुषों के अनुसार तीर्थो को 6 प्रकार की श्रेणी में रखा जा सकता है ! जो निम्नलिखित है !

(1) सनातन तीर्थ -:
(2) भगवदीय तीर्थ -:
(3) वर्तमानीय तीर्थ -:
(4) शास्त्रीयतीर्थ -:
(5) आस पास के तीर्थ -:
(6) स्वयं तीर्थ -:

इनमे से तीन प्रकार के ऐसे तीर्थ है ! जो कि अपने स्थान पर सदा के लिए स्थित रहते है ! और मनुष्य खुद चलकर उनके पास जाता है ! जैसे की सनातन तीर्थ, भगवदीय तीर्थ, वर्तमानीय तीर्थ ! बाकी तीन प्रकार के तीर्थ जो कि सदैव हमारे आस पास रहते है ! अब इन सभी का बारी बारी करके संक्षिप्त में वर्णन करता हूँ !

सनातन तीर्थ -: सनातन तीर्थ, वे तीर्थ होते है ! जहाँ भूमि में सृष्टि के प्रारम्भ से ही दिव्य और पावनकारी शक्तिया है ! अर्थात जिस स्थान पर सृष्टि के प्रारम्भ से ही ईश्वर किसी ना किसी रूप में वास करते है ! उदाहरण के लिए जैसे कैलाशमानसरोवर ,काशी आदि नित्य तीर्थ है ! इसी तरह गंगा यमुना नर्मदा कावेरी आदि पवित्र नदियाँ भी नित्य तीर्थ कि श्रेणी में आती है !

भगवदीय तीर्थ -: भगवदीय तीर्थ, वो तीर्थ है जहाँ भगवान ने किसी न किसी रूप में अवतार लिया हो या उन्होंने वहाँ पर कोई लीला की हो या फिर भगवान ने अपने भक्त की भक्ति से प्रसन्न हो होकर दर्शन दिए हो या भक्त की प्रार्थना पर उस स्थान पर सदा की लिए वास किया हो !

यह सभी स्थल भगवदीय तीर्थ है ! इस धरती पर भगवान के चरण जहां -जहां पड़े वह भूमि दिव्य हो गई ! अतः ऐसे सभी स्थल भगवदीय तीर्थ की श्रेणी में आते है उदाहरण के लिए जैसे 12 ज्योतिर्लिंग, वृन्दावन , अयोध्या आदि

वर्तमानीय तीर्थ -: जो स्थान संतो एवं भक्तो के द्वारा सेवन किये गए हो ! जहां उनका वास किया गया हो, अथवा उनके द्वारा तप या साधना की गयी हो ! उनका जन्म स्थल समाधि स्थल भी इसी श्रेणी के तीर्थ के अंतर्गत आते है ! क्योकि वास्तविक संत अथवा भक्त जीवन्मुक्त, देहभानतीत, भगवदप्रेमतंमय होते है ! उनका शरीर भले ही पांच भौतिक तत्वों से निर्मित और नश्वर हो ! किन्तु उस देह में संत के दिव्य गुण ओतप्रोत है ! उस देह से उन दिव्य गुणों की ऊर्जा सदा बाहर निकलती रहती है और जो वस्तुए, मनुष्य, भूमि आदि जो भी उनके संपर्क में आते है ! वह ऊर्जा उनको प्रभावित करती है ! इसलिए संत के चरण जहां जहां पड़ते है ! वह भूमि तीर्थ बन जाती है ! संत अथवा भक्त की जन्म भूमि,साधना भूमि, समाधी स्थल आदि इसलिए तीर्थ माने गए है !

शास्त्रीय तीर्थ -: शास्त्रीय तीर्थ के अन्तर्गत हमारी संस्कृति के कुछ शास्त्र आते है ! जैसे कि श्रीमद्भागवत गीता, श्रीमद्भागवत पुराण , रामायण आदि यह इसलिए तीर्थ की श्रेणी में आते है ! क्योकि इनके पाठ से अथवा श्रवण से , मनन से और जीवन में धारण करने से मानव जीवन में पूर्णतः परिवर्तन आ जाता है और सारा खेल तो केवल सोच मात्रा का ही है ! जहां सोच बदली वहाँ कर्म और जहां कर्म बदले वहाँ जीवन ! यदि हम महापुरुषों का इतिहास उठा कर देखेंगे तो हम पाएंगे कि सभी महापुरुषों के जीवन में इन शास्त्रों का बहुत बड़ा प्रभाव रहा है ! उन्होंने अपने जीवन को इन शास्त्रों के अनुसार ढालकर महानता हासिल की है ! माना जाता है कि हमारे इन शास्त्रों का जहां भी पाठ किया जाता वह स्थान और वहाँ के आसपास का सम्पूर्ण वायुमंडल पवित्र हो जाता है तथा जो भी इनका पाठ करता है ! वह भी पवित्र हो जाता है ! उसके जीवन के संकटो का नाश होता है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है ! अतः ये शास्त्र भी तीर्थ रूप ही है !

आस पास के तीर्थ-: मित्रो मै आपको अपनी दूसरी पोस्ट “तीर्थ किसे कहते है ” में बता चुका हूँ ! हमारे आस पास के तीर्थो के बारे में, कि हमारे आस पास भी बहुत से तीर्थ है ! जो कि निम्नलिखित है !

माता-पिता -: देखिये माँ और पिता के बारे में जितना वर्णन किया जाये उतना कम है ! उनकी करुणा और उनके प्यार को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है ! फिर भी में कम से कम शब्दों में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ ! माता पिता ने सर्वप्रथम हमे यह शरीर दिया है ! आज हम जो कुछ भी है ! या हमारे पास जो कुछ भी है वो सब उन्ही का ही तो है ! हमारी सोच उनकी करुणा और प्यार को पूर्णतः समझ नहीं सकती ! पल पल उन्होंने हमारा हर तरह से ख्याल रखा है ! माता पिता का सम्पूर्ण जीवन ही अपनी संतान के लिए होता है ! उनके कोमल हृदय में संतान की भलाई और पवित्र प्यार के आलावा कुछ भी नहीं होता! इसलिए वो हमारे लिए सर्वप्रथम एवं सबसे नजदीकी तीर्थ है ! शास्त्रों एवं महापुरुषों के अनुसार – संतान के लिए लोक और परलोक में माता पिता के समान कोई तीर्थ नहीं है ! माता पिता का जिसने पूजन नहीं किया ! उसको वेदो से क्या प्रयोजन है ! संतान के लिए माता पिता का सम्मान, सेवा, पूजा ही धर्म है ! वही तीर्थ है, वही मोक्ष है, वही जन्म का शुभ फल है !

भगवान श्री कृष्ण जी के अनुसार – जब भीम जी के पुत्र घटोत्कच्छ जी का विवाह मोरवी नामक कन्या से तय हो गया था ! उस समय भगवान श्री कृष्ण जी ने घटोत्कच्छ जी से कहा कि सर्वप्रथम अपनी माँ से आशीर्वाद ले कर आओ ! उनके आशीर्वाद में संतान का सम्पूर्ण सुख छिपा होता है ! जो संतान घर से जाते वक्त अथवा आते वक्त अपने माता पिता के पैर छूती है अथवा किसी भी बहाने से उनके पैर को छूती है ! उतनी ही बार वह स्वर्ग के दरवाजे को खड़खड़ाती है !

भगवान श्री रामजी के अनुसार – एक समय की बात है ! जब भगवान श्री राम जी ने यह बात सुनी कि हनुमान जी उनकी सेवा को छोडकर अपने माता पिता से मिलने अपने घर नहीं जाना चाहते ! तब हनुमान जी को श्री राम जी ने अपने पास बुलाकर कहा कि – हनुमान, माता पिता के समान इस संसार में किसी का स्थान अथवा पद नहीं है ! इनका स्थान संसार में सबसे पहला, ऊँचा व बड़ा है ! ईश्वर से भी पहले और ईश्वर से भी बड़ा – तुम्हे सारे कार्य छोड़कर तुरंत अपने मातापिता से मिलने जाना चाहिए !

पति तीर्थ -: पद्धमपुराण के अनुसार, जो स्त्री अपने पति के दाहिने चरण को प्रयाग और बाए चरण को पुष्कर समझकर चरणोदक से स्नान करती है ! उसे इन तीर्थो में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होता है !

Loving senior Indian couple holding hands

पत्नी तीर्थ -: पद्धमपुराण पुराण के अनुसार जिस घर में सभी प्रकार के सदाचार का पालन करने वाली, प्रशंसा योग्य आचरण करने वाली, धर्म साधना में लगी हुई ,सदा पातिव्रत्य का पालन करने वाली तथा ज्ञान की नित्य अनुरागिनी है ! उस घर में सदा देवता निवास करते है ! पितृ भी उसके घर में रहकर सदा उसके कल्याण की कामना करते है ! जिसके घर में ऐसी सत्यपरायणा, पवित्र हृदया ,सती रहती है ! उस घर में गंगा आदि पवित्र नदियाँ आदि सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते है ! कल्याण तथा उद्धार के समान भार्या के समान कोई तीर्थ नहीं है ! भार्या के समान सुख नहीं है !पुण्य नहीं है !

गुरु तीर्थ -: शास्त्रानुसार सूर्य दिन में प्रकाश करता है और चन्द्रमा रात में प्रकाश करता है ! लेकिन एक गुरु अपने शिष्य के ह्रदय में दिन रात सदैव ही प्रकाश फैलाते है ! वे शिष्यों के सम्पूर्ण अज्ञानमय अंधकार का नाश कर देते है !इसलिए शिष्यों के लिए गुरु ही परम् तीर्थ है !

स्वयं तीर्थ -: इस तीर्थ के अंतर्गत में, अपने ही शरीर की बात कर रहा हूँ ! मानव जाती में लगभग 99 % लोग अपने ही सामर्थ्य और आनंद से अनजान है और इस सामर्थ्य और आनंद का ज्ञान हमें हमारे योगियों, संतो, महापुरुषों के द्वारा होता है ! जब हम उनके द्वारा प्रदान की गई अथवा बताई गई युक्तियों का प्रयोग कर भक्ति व अंतर साधना में डूबते है, तो हमारा अंतःकरण पवित्र होता है ! जिससे हमारे जीवन से नकारात्मकता व अज्ञानता का अंत होता है तथा भावनाओ और शरीर की शुद्धि हो ये भी पवित्र होते है ! जिससे हमारा और अन्यो का भी कल्याण होता है !

कृप्या अपनी सलाह अथवा सुझाव जरूर दे !

यदि कोई गलती हो तो क्षमा

धन्यवाद्

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