तीर्थ यात्रा करते समय किन किन बातो का रखे ध्यान अथवा भारतीय हिन्दू सनातन संस्कृति में तीर्थ यात्रा करने की परम्पराये एवं नियम

what should be kept in mind while doing pilgrimage traditions and rules of pilgrimage in Indian Hindu sanatan culture

तीर्थ यात्रा पर इन बातों का रखें ध्यान, वरना रूठ सकते हैं भगवान। धार्मिक अथवा तीर्थ यात्रा पर जाते समय किन किन बातों का रखें ध्यान

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हमारे जीवन में तीर्थ यात्रा का विशेष महत्व है। सभी लोग दूर-दूर की तीर्थ यात्रा पर जाते हैं। तीर्थयात्रा का धार्मिक महत्व अनेक वेद और पुराणों में वर्णित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि किसी भी धार्मिक अथवा तीर्थ यात्रा पर जाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। आइए जानते हैं.

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तीर्थ मार्ग में सत्संग:- तीर्थ यात्रा के लिए शास्त्रीय निर्देश यह है कि उसे पद यात्रा के रूप में ही किया जाए। यह परंपरा कई जगह निभती दिखाई देती है। पहले धर्म परायण व्यक्ति छोटी-बड़ी मंडलियां बनाकर तीर्थ यात्रा पर निकलते थे। यात्रा के मार्ग और पड़ाव निश्चित थे। मार्ग में जो गांव, बस्तियां, झोंपड़े आदि मिलते थे, उनमें रुकते किसी उपयुक्त स्थान पर रात्रि विश्राम करते थे। जहां रुकना वहां धर्म चर्चा करना-लोगों को कथा सुनाना, भगवन नाम संकीर्तन करना यह क्रम प्रातः से सायंकाल तक चलता था। रात्रि पड़ाव में भी कथा कीर्तन, सत्संग का क्रम बनता था।

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सवारी पर चढ़कर अथवा पैरों में खड़ाऊ पहनकर श्री भगवान के मंदिर में नहीं जाना चाहिये ।

अशौच-अवस्‍था में भगवान के श्री विग्रह के दर्शन नहीं करने चाहिये।

श्रीमूर्ति के दर्शन करके प्रणाम जरूर करना चाहिये ।

एक हाथ से प्रणाम नहीं करने चाहिये।

श्री भगवान के श्रीविग्रह के सामने दूसरे किसी को भी प्रणाम नहीं करना चाहिये ।

श्री भगवान के विग्रह की परिक्रमा करते समय भगवान के सामने आकर कुछ देर रुककर फिर परिक्रमा करनी चाहिये और केवल सामने ही परिक्रमा नहीं करते रहना चाहिये ।

श्री भगवान के श्रीविग्रह को पीठ देकर नहीं बैठना चाहिये ।

श्री भगवान के श्रीविग्रह के सामने पैर पसारकर नहीं बैठना चाहिये। अथवा दोनों घुटनों को ऊंचा करके उनको हाथों से लपेटकर नहीं बैठ जाना।

श्री भगवान को निवेदित किए बिना किसी भी वस्तु अथवा ऋतू फल आदि को खाना-पीना नहीं चाहिये

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किसी शाक या फलादि के अगले भाग को तोड़कर भगवान के व्यंजनादि के लिए नहीं देना चाहिये ।

यदि आप के पास सामर्थ्य है तो तन, मन, धन से सेवा पूजा जरूर करनी चहिये उसका त्याग अथवा लापरवाही नहीं करनी चहिये

श्री भगवान के श्रीविग्रह के समक्ष भोजन करना, कम्बल अथवा चादर से अपने पुरे शरीर को ढक लेना, सो जाना, जोर से बोलना, चिल्लाना, कलह करना, निष्ठुर वचन बोलना, दूसरों की निंदा करना, दूसरों की स्तुत‍ि करना, अश्लील शब्द बोलना, किसी पर अनुग्रह करना, अधोवायु का त्याग करना आदि ये कर्म नहीं करने चाहिये।

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रथयात्रा, जन्माष्टमी आदि उत्सवों का करना या उनके दर्शन करनें चाहिये

तीर्थ यात्रा के दौरान अथवा तीर्थ स्थल में किसी भी प्राणी पर मन ,वचन और कर्म दवरा हिंसा नही करनी चाहिए अथवा पीड़ा नहीं देनी चाहिये।

तीर्थ यात्रा के दौरान अथवा तीर्थ स्थान में झूठ नहीं बोलना, चोरी नहीं करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये

गुरुदेव की अभ्यर्थना, कुशल-प्रश्न और उनका स्तवन करना चाहिये।

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अपने मुख से अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये ।

किसी भी देवता की निंदा नहीं करनी चाहिये ।

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अगली पोस्ट – कैसे मिलेगा तीर्थ यात्रा करने का फल और किसको मिलेगा तीर्थ यात्रा करने का कितना फल।

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