जानिए किसे मिलता है तीर्थ यात्रा का संपूर्ण फल, किसे बिल्कुल नहीं और किसे आंशिक

यदि तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं तो यात्रा पर जाने से पूर्व जान ले यह बातें कि – कैसे मिलेगा तीर्थ यात्रा करने का संपूर्ण फल और किसे, किसे मिलेगा तीर्थ यात्रा करने का आंशिक फल और किसे बिल्कुल नहीं

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किसे तीर्थ यात्रा करने का वास्तविक एवं संपूर्ण फल प्राप्त होता है

जिसकी आखो में भगवान की छवि समाई हुई है। जिसकी वाणी भगवन नाम और यश के संकीर्तन में लगी हुई है। जिसके कान भगवद शास्त्रों का श्रवण करते है। जिसके हाथ सेवा कार्य में निरंतर लगे हैं। पैर भगवान के स्थानों में जाते हैं। जिसका मन भगवान तथा भगवद शास्त्रों के चिंतन में संलग्न रहता है। जो कष्ट सहकर भी अपने धर्म का पालन करता है। जिसका लक्ष्य और प्रत्येक कार्य भगवान की कृपा और प्रसन्नता प्राप्त करना मात्र के लिए है। वही तीर्थ के फल को प्राप्त करता है।

जिसके द्वारा जाने अनजाने में भी किसी की आत्मा को ना सताया गया हो। जिसका अपनी कर्मेंद्रियों और ज्ञान इंद्रियों पर पूर्ण संयम हो। जो हर प्रकार से संतुष्ट रहने वाला हो। सभी प्रकार के द्वंदों में अर्थात सुख और दुख में सम रहने वाला हो अहंकार से रहित हो। कम खाने वाला हो। क्रोध पर और काम पर विजय प्राप्त करने वाला हो। श्रद्धा वान हो, शुद्ध कर्म करने वाला हो, शुद्ध विचार रखें,सद्भाव रखें। वही तीर्थ के वास्तविक एवं संपूर्ण फल का भागी होता है

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प्रतिग्रह से निवृत्त ,संतुष्ट,अहंकार से मुक्त,दंभ हीन,अल्पाहारी,जितेन्द्रिय,क्रोध रहित,सत्यवादी,आसक्तियों से मुक्त,दृढ निश्चयी और सब प्राणियों में अपनी ही आत्मा को देखने वाला तीर्थ के फल को प्राप्त करता है

काशी खंड (6 /49 -51 ) स्कन्द पुराण

किसे तीर्थ यात्रा करने का फल प्राप्त ही नहीं होता है

श्रद्धाहीन ,स्वभाव से पापी,नास्तिक,संदेहशील और हेतु वादी ,इन पाँचों को तीर्थ फल की प्राप्ति नहीं होती

काशी खंड (6 /54 ) स्कन्द पुराण

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लोभी,चुगल खोर,निर्दयी ,दम्भी,विषयों में आसक्त,समस्त तीर्थों में स्नान करके भी पापी और मलिन ही रहते हैं तथा  संयमित इन्द्रियों वाला जहां निवास करता है उसके लिए वहीं कुरुक्षेत्र आदि तीर्थ स्थित हैं

ऋषि अगस्त्य  (काशी खंड स्कन्द पुराण )

तीर्थ क्षेत्र में जाने पर मनुष्य को स्नान दान जप आदि करना चाहिए अन्यथा वह रोग एवं दोष का भागी होता है

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किसे तीर्थ यात्रा करने का आंशिक फल प्राप्त होता है

जब कोई अपने माता-पिता भाई परिजन अथवा गुरु को फल प्रदान करने के उद्देश्य से तीर्थ में स्नान करता है तब उसे स्नान के फल का 12 वां भाग प्राप्त हो जाता है

दूसरों के धन से तीर्थ यात्रा करने से व्यक्ति को पुण्य का सोहलवा भाग प्राप्त होता है

जो दूसरे कार्य के प्रसंग से तीर्थ में जाता है उसे तीर्थ का आधा फल प्राप्त होता है

और अंत में अन्य जगह किया हुआ पाप तीर्थ में जाने से नष्ट हो जाता है लेकिन तीर्थ में किया हुआ पाप नष्ट नहीं होता है

यदि कोई गलती हो तो क्षमा करना

धन्यवाद

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