माँ दुर्गा के 9 अलग-अलग स्वरूप से संबन्धित 9 अलग-अलग दर्शनीय प्राचीन मंदिर

क्या आप जानते है ? नवरात्री की अधिष्ठात्री माँ दुर्गा के 9 स्वरूप एवं प्रत्येक स्वरुप से संबन्धित माँ के 9 अलग – अलग दर्शनीय, प्राचीन मंदिर स्थल बहुत ही संक्षेप में-:

शायद हम यह बात नहीं जानते है कि, जिस प्रकार से नवरात्री के दौरान प्रत्येक दिन हम माँ दुर्गा के अलग – अलग 9 स्वरुप की उपासना करते है। उसी प्रकार से माँ दुर्गा के प्रत्येक स्वरुप से संबन्धित 9 अलग-अलग पौराणिक, ऐतिहासिक, प्राचीन मंदिर हमारे भारत देश में स्थित है। प्रत्येक मंदिर में माँ के प्रत्येक विग्रह के दर्शन करने का अलग – अलग फल एवं अपना एक रहस्यमय इतिहास है। मै यहाँ पर बहुत ही संक्षेप में माँ के 9 स्वरुप और 9 मंदिर का वर्णन कर रहा हूँ।

यदि आप नवरात्री के प्रत्येक दिन और माँ के 9 स्वरूपों में प्रत्येक स्वरुप का
इतिहास, महत्व, उपासना आदि के बारे में

माँ के 9 स्वरूपों से संबन्धित इन मंदिरो की स्थापना के पीछे छिपे रहस्य

और

इनमे स्थित माँ के स्वरुप के दर्शन करने से पूरी होने वाली कामनाओ के बारे में

विस्तृत रूप से जानना चाहते है तो । मै माँ के प्रत्येक स्वरूप पर 9 अलग – अलग पोस्ट बना चुका हूँ। जिसे आप मेरे ब्लॉग www.bhartiyatirth.com पढ़ सकते है।

मां दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री का है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनको शैलपुत्री कहा गया। काशी के अलईपुर में है। माँ शैलपुत्री का मंदिर। इस मंदिर की मान्यता है कि नवरात्री के पहले दिन इनके दर्शन से भगतो की हर मुराद पूरी होती है।

मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्मा शब्द का अर्थ तपस्या से है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप की चारिणी यानि तप का आचरण करने वाली। मां ब्रह्मचारिणी का मंदिर काशी के सप्तसागर (कर्णघंटा) क्षेत्र में स्थित है. मां दुर्गा की पूजा के क्रम में ब्रह्मचारिणी देवी का दर्शन-पूजन बहुत महत्‍वपूर्ण माना गया है.

मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघण्टा है। नवरात्र उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन व आराधना की जाती है। इनका स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है। इसी कारण इस देवी का नाम चंद्रघण्टा पड़ा ! वाराणसी में चंद्रघंटा मंदिर है जहाँ देवी दुर्गा के तीसरे रूप की पूजा की जाती है।

माता दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। अपनी मंद, हल्की हंसी द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा पड़ा। माँ कुष्माण्डा का मंदिर उतर प्रदेश के सागर – कानपुर के बीच घाटमपुर में स्थित है। यहाँ माँ कुष्माण्डा लेटी हुई मुद्रा में है।

मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है। कार्तिकेय की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। स्कंदमाता का प्राचीन मंदिर वाराणसी में स्थित है।

मां दुर्गा के छठे स्वरूप को कात्यायनी कहते हैं। कात्यायनी महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी इसलिए ये कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। भगवान श्री कृष्ण जी की नगरी वृंदावन में माँ कात्यायनी का प्राचीन सिद्ध पीठ मंदिर स्थित है।

मां दुर्गा के सातवें स्वरूप को कालरात्रि कहा जाता है। मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश और ग्रह बाधाओं को दूर करने वाली हैं। वाराणसी में माँ कालरात्रि का श्री विग्रह कालिका गली के मंदिर में स्थित है।

माँ दुर्गाजी के आठवें स्वरुप का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। तपस्या के द्वारा अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण प्राप्त करने के कारण माँ का नाम महागौरी पड़ा। माँ महागौरी जी का मंदिर वाराणसी और लुधियाना में स्थित है।

मां दुर्गा की नौवीं शक्ति को सिद्धिदात्री कहते हैं। जैसा कि नाम से प्रकट है ये सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। माँ सिद्धिदात्री का मंदिर वाराणसी,सतना मध्य प्रदेश और मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित है।

नवरात्री के प्रत्येक दिन, माँ के प्रत्येक स्वरुप इनसे संबंधित उपासना का महत्व और संबन्धित 9 मंदिर एवं स्थापना के पीछे छिपे रहस्य के बारे में विस्तृत जानने के लिए। आप संबंधित पोस्ट ब्लॉग www.bhartiyatirth.com पर पढ़ अथवा देख सकते है।

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