जहा विराजती है स्वयं पिंडी रूप में, माँ कुष्मांडा का एक मात्र मंदिर

बेहद खास है ये माँ कुष्मांडा का इकलौता प्राचीन एवं चमत्कारिक मंदिर

कानपुर के घाटमपुर में भारत का इकलौता माँ कुष्मांडा का मंदिर स्थापित है

इस मंदिर में माँ पिंडी के रूप में लेटी हुई मुद्रा में विराजमान है।

पिंडी के रूप में लेटी माँ, चरणों से करती है अमृत वर्षा

यह प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई है

माँ कुष्मांडा के इस स्थान के बारे में शिव पुराण में भी है वर्णन।

दुर्गा माँ का चौथा स्वरुप माँ कुष्मांडा देवी

नवरात्र-पूजन के चौथे दिन माँ कुष्माण्डा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। अपनी मंद, हल्की हँसी द्वारा अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के रूप में पूजा जाता है। इस कारण से भी माँ कूष्माण्डा कहलाती हैं।जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।

इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है।

माँ कुष्मांडा देवी का स्वरुप

माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है।

इस दिन साधक का मन ‘अनाहत’ चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए।

माँ कुष्मांडा का मंत्र -:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे॥

माँ का प्रिय भोग प्रसाद

मां को भोग में मालपूआ अति प्रिय है।

माँ कुष्मांडा का प्रिय रंग

सिलेटी रंग माँ को अधिक प्रिय है इस दिन इस रंग के उपयोग से आप मां कुष्मांडा को प्रसन्न कर सकते हैं।

माँ कुष्मांडा देवी के रूप में किसकी करे पूजा

इस दिन जहाँ तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिलाना श्रेयस्कर है। इसके बाद फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान भेंट करना चाहिए। जिससे माताजी प्रसन्न होती हैं। और मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

माँ कुष्मांडा की महिमा

माँ कूष्माण्डा बहुत ही कम सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।

विधि-विधान से माँ के भक्ति-मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख स्वरूप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है। माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है।

माँ कुष्मांडा की उपासना की महत्व

माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है

माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों-व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। अतः अपनी लौकिक, पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए।

माँ कुष्मांडा का अद्भुत एवं चमत्कारिक मंदिर

नवरात्री के चौथी माँ कुष्मांडा का एक मात्र मंदिर जहा विराजती है माँ पिंडी रूप में

नवरात्र की चौथी देवी माता कूष्मांडा का एकमात्र अद्भुत मंदिर पूरे देश में सिर्फ कानपुर से करीब 60 किमी दूर घाटमपुर ब्लॉक में है। इस मंदिर में माता पिंडी के रूप में विराजित हैं। इनका आदि और अंत नहीं मिलता इसी कारण ये लेटी मुद्रा में प्रतीत होती है।

पिंड स्वरूप में लेटी मां कुष्मांडा के चरणों से लगातार पानी रिसता रहता है और कभी समाप्त नहीं होता। कहते हैं इस जल को पीने से कई तरह की बीमारियां दूर हो जाती हैं। इसके साथ ही इसी जल को आखों पर लगाने से कई प्रकार के नेत्र रोगों से छुटकारा मिल जाता है। हालांकि, यह अब तक रहस्य बना हुआ है कि पिंडी से पानी कैसे निकलता है।

कूष्मांडा देवी मंदिर परिसर में दो तालाब बने हैं। भक्त तालाब में स्नान करने के बाद दूसरे कुंड से जल लेकर माता को चढ़ाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार माँ कुष्मांडा की पिण्डी का इतिहास

शिव महापुराण के अनुसार, भगवान शंकर की पत्नी माता सती के दिव्य शरीर के अंश अलग-अलग स्थानों में गिरे थे। माना जाता है कि चौथा अंश घाटमपुर में गिरा था। तब से ही यहां माता कुष्मांडा विराजमान हैं।

स्थानीय लोगो की मान्यता के अनुसार माँ कुष्मांडा के मंदिर के इतिहास

  • मंदिर के पुजारी परशुराम दुबे के मुताबिक, मां कुष्मांडा की पिंडी कितनी पुरानी है, इसकी गणना करना मुश्किल है।
  • घाटमपुर क्षेत्र कभी घनघोर जंगल था। उस दौरान एक कुड़हा नाम का ग्वाला गाय चराने आता था।
  • उसकी गाय चरते चरते मां की पिंडी के पास आ जाती थी और पूरा दूध माता की पिंडी के पास निकाल देती थी।
  • जब कुड़हा शाम को घर जाता था तो उसकी गाय दूध नहीं देती थी। एक दिन कुड़हा ने गाय का पीछा किया तो उसने सारा माजरा देखा।
  • यह देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने यह बात गांव में लोगों को बताई। सबने जाकर झाड़ी के नीचे खुदाई की तो माता कुष्मांडा की पिंडी मिली। और वह पर आज माता का मंदिर स्थापित है।
  • पिंडी से निकलने वाले पानी को लोग माता का प्रसाद मानकर पीने लगे।
  • कहते हैं कि अगर सूर्योदय से पहले नहा कर छह महीने तक इस नीर का इस्तेमाल किसी भी बीमारी में करे तो उसकी बीमारी सौ फीसदी ठीक हो जाती है।

चरवाहे कुड़हा के नाम पर मां कूष्मांडा का एक नाम कुड़हा देवी भी है। स्थानीय लोग इसी नाम से पुकारते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक कूष्मांडा देवी के वर्तमान मंदिर का निर्माण 1890 में कसबे के चंदीदीन भुर्जी ने कराया था। सितंबर 1988 से मंदिर में मां कूष्मांडा की अखंड ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित हो रही है।

पुस्तकों में भी की चर्चा

कई पुस्तकों में मंदिर निर्माण और महत्व का जिक्र किया गया है
भदरस गांव निवासी कवि उम्मेदराय खरे की सन् 1783 में फारसी में लिखी गई पांडुलिपि (ऐश आफ्जा) में माता कूष्मांडा और पड़ोसी गांव भदरस की माता भद्रकाली के स्वरूपों का वर्णन किया है। कानपुर इतिहास के लेखक लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और नारायण प्रसाद अरोड़ा ने घाटमपुर की कूष्मांडा देवी का उल्लेख किया है।

नवरात्र पर्व पर लगता है मेला

नवरात्र पर्व पर मंदिर में मेला लगता है। चतुर्थी तिथि पर हजारों भक्त माता के दर्शन करने आते हैं। मनोकामना पूरी होने पर मैया को चुनरी, ध्वजा, नारियल और घंटा चढ़ाने के साथ ही भीगे चने अर्पण करते हैं।

कूष्मांडा देवी के मंदिर में मूर्ति की पूजा कोई पंडित नहीं करवाता । बल्कि वहां के माली ही करते हैं।
मंदिर में व्यवस्था के लिए मालियों की समिति है। आने वाले चढ़ावे से आरती-प्रसाद की व्यवस्था करने के बाद बचे धन को पारिश्रमिक के रूप में बांट लेते हैं। माता के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद हमेशा पूरी होती है।

ऐसे पहुंचें मां के दरबार

चतुर्थ देवी कूष्मांडा सिद्धपीठ पहुंचने के लिए बस के जरिए और कानपुर-बांदा रेल लाइन से घाटमपुर स्टेशन उतरकर मंदिर पहुंचा जा सकता है। मंदिर कानपुर-सागर राजमार्ग के किनारे स्थित है। वहां पहुंचने के लिए हर समय साधन मिलते हैं। कानपुर के नौबस्ता बाईपास से मंदिर मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर है।

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