काशी स्थित माँ शैलपुत्री का मंदिर जहां मात्र दर्शन करने से दूर होती है विवाह एवं दाम्पत्य जीवन से संबंधित बाधाएं

नवरात्रि की अधिष्ठात्री माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों में से प्रथम स्वरुप माँ शैलपुत्री का सबसे प्राचीन एवं ऐतिहासिक वाराणसी में स्थित प्रसिद्ध मंदिर जहाँ पर आज भी विराजमान है माँ शैलपुत्री और करती है भक्तो की मनोकामनाये पूरी इसके साथ साथ दूर होती है विवाह एवं दाम्पत्य जीवन से संबंधित बाधाएं

जानिए नवरात्री की अधिष्ठात्री माँ दुर्गा का पहला स्वरुप शैलपुत्री का अद्भुत इतिहास, इनकी उपासना का महत्व, पसंदीदा रंग और भोग प्रशाद

तथा

माँ शैलपुत्री का वाराणसी अथवा काशी में ऐसा मंदिर जहाँ मात्र दर्शन करने से पूरी होती है समस्त मनोकामनाये इसके साथ साथ दूर होती है विवाह एवं दाम्पत्य जीवन से संबंधित बाधाएं


माँ शैलपुत्री का अद्भुत स्वरुप

दुर्गाजी पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम
शैलपुत्री ‘ पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। इन्हे समस्त जीव जन्तुओ का रक्षक माना जाता है।

माँ शैलपुत्री का स्मरण मंत्र

वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

माँ शैलपुत्री के प्राकट्य का इतिहास

एक बार जब माँ सती के पिता प्रजापति दक्ष ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, पर भगवान शंकर को नहीं।माँ सती अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। परन्तु माँ सती संतुष्ट नही हुईं।

माँ सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। माँ सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव था। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे माँ सती को क्लेश पहुंचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपनेआप को जलाकर भस्म कर लिया।

इस दारुण दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने तांडव करते हुये उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही माँ सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मी और माँ शैलपुत्री कहलाईं। माँ शैलपुत्री का विवाह भी फिर से भगवान शंकर से हुआ। माँ शैलपुत्री शिव की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है।

माँ शैलपुत्री के अन्य नाम

माँ शैलपुत्री को अन्य नामो से भी जाना जाता है। जैसे कि -: सती, पार्वती, वृषारूढ़ा, हेमवती और भवानी भी इसी देवी के अन्य नाम हैं।

माँ शैलपुत्री का पसंदीदा रंग एवं भोग परशाद एवं इनका महत्व

मां शैलपुत्री का पसंदीदा रंग लाल है, जो कि उल्लास, साहस और शक्ति का रंग माना जाता है। इस दिन लाल रंग का प्रयोग करने पर मां शैलपुत्री शीघ्र प्रसन्न होकर निर्णय क्षमता में वृद्धि करती हैं और इच्छ‍ित फल प्रदान करती है। इन्हें गाय का घी अथवा उससे बने पदार्थों का भोग लगाया जाता है।

प्रथम दिन की पूजा में योगीजन अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना शुरू होती है। माँ शैलपुत्री की उपासना से मनुष्य अपने मन पर काबू करने के योग्य होता है तथा अपनी आवंछित कामनाओ और वासनाओ पर जीत हासिल करता है।

माँ शैलपुत्री का अति प्राचीन,ऐतिहासिक एवं प्रसिद्ध मंदिर

अब बात करते है माँ के उस चमत्कारिक मंदिर की जहां माँ के दिव्य विग्रह के दर्शन करने मात्र से होती है पूरी मनोवांछित कामनाये

माँ शैलपुत्री का अति प्रचीन मंदिर पुरे भारत में प्रसिद्द है। यहाँ पर लोग दर्शन करने के लिए दूर दूर से आते है

दर्शन मात्र से पूरी होती है मुराद और होता है वैवाहिक कष्ट का निवारण

माना जाता है कि यहाँ पर आने मात्र से ही भक्तो की मुराद पुरी हो जाती है। नवरात्र में माँ के दर्शन करने से शादीशुदा जोडो के वैवाहिक कष्ट दूर हो जाते है। कहा जाता है कि माँ के इसी स्वरुप ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस कारण माँ के इस स्वरुप के दर्शन करने मात्र से लोगो के वैवाहिक कष्ट दूर हो जाते है। यह शैलपुत्री का मंदिर घाटों के शहर कहे जाने वाले वाराणसी में स्थित है।

माँ शैलपुत्री के वाराणसी में स्थित इस मंदिर का इतिहास

वाराणसी के इस माँ शैलपुत्री के मंदिर के बारे में एक बहुत ही प्रचलित कथा है। माँ पार्वती ने हिमवान की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री कहलाई। एक बार की बात है जब माता भगवान शिव से किसी बात पर कैलाश से काशी आ गई। इसके बाद जब भोले नाथ उन्हें मनाने आये तो उन्होंने भोलेनाथ से आग्रह करते हुए कहा कि यह स्थान उन्हे बेहद प्रिय लग रहा है और वह वहाँ से जाना नहीं चाहती। जिसके बाद से माता यही विराजमान है। माता के दर्शन को आया हर भक्त उनके दिव्य रूप के रंग में रंग जाता है।

माँ को चढ़ावा

माँ शैलपुत्री के इस मंदिर में दिन में तीन बार आरती होती है और इन्हे चढ़ावे में नारियल के साथ सुहाग का सामान चढ़ाया जाता है। यहां पर नवरात्र में पहले दिन माँ के दर्शनों के लिए भक्त इतने व्याकुल होते है कि एक दिन पहले ही माँ के दर्शनों के लिए लाइन लग जाती है।

अगर आप भी विवाह एवं दाम्पत्य जीवन से संबंधित परेशानियों से जूझ रहे है तो अवश्य एक बार प्रथम नवरात्री के दिन माँ के इस आलौकिक स्वरुप के दर्शन कर सकते है और अपने संकटो से छुटकारा पा सकते है।

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