काशी में है मां ब्रह्मचारिणी का अदभुत मंदिर,करती हैं हर मनोकामना पूरी

जानिए काशी के वाराणसी में स्थित माता ब्रह्मचारिणी का अद्भुत एवं चमत्कारिक प्राचीन मंदिर दर्शन से मिलता है यश, कीर्ति, संतान सुख और होती है सभी मनोकामनाएं पूरी

और साथ ही

जानिए मा ब्रह्मचारिणी का नाम ब्रह्मचारिणी क्यों पड़ा ? मां ब्रह्मचारिणी का अद्भुत स्वरूप कैसा है ? मां ब्रह्मचारिणी की उपासना क्यों करें ? माँ की उपासना का महत्व अथवा उससे प्राप्त होने वाला लाभ क्या है ? माँ ब्रह्मचारिणी का अद्भुत इतिहास एवं रहस्य ?

दुर्गा माँ के दूसरे स्वरुप का नाम माँ ब्रह्मचारिणी क्यों

नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं।

ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। हजारो वर्ष कठोर तपस्या करने के कारण ही माँ का नाम ब्रह्मचरिणी प्रसिद्ध हुआ। माँ के इस स्वरुप का एक अन्य नाम अपर्णा भी है।

माँ ब्रह्मचारिणी का अद्भुत स्वरुप

ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इसके बाएं हाथ में कमण्डल और दाएं हाथ में जप की माला रहती है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल प्रदान करने वाला है।

माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना अथवा पूजा

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विशेष विधान है। सबसे पहले प्रातः स्नान कर साफ कपड़े पहन लें। उसके बाद देवी को स्नान करा कर धूप, दीप, चंदन, अक्षत और रोली चढ़ाएं।

मां को गुड़हल के फूल बहुत पसंद हैं इसलिए गुड़हल के फूलों की माला अर्पित करें।

माँ ब्रह्मचारिणी का मंत्र :

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

माँ ब्रह्मचारिणी का पसंदीदा रंग

मां ब्रम्हचारिणी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। अत: नवरात्र‍ि के दूसरे दिन पीले रंग के वस्त्रादि का प्रयोग कर मां की आराधना करना शुभ होता है।

माँ ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग

मां को शक्कर का भोग प्रिय है।

माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना का महत्व अथवा लाभ

माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। जीवन में वे जिस बात का संकल्प कर लेते हैं। उसे पूरा करके ही रहते हैं।

साथ ही इनकी पूजा से आत्मविश्वास, उत्साह और साहस मिलता है और मनुष्य कर्मठ बनता है। देवी की साधना करने से जीवन का अंधकार मिट जाता है और अलौकिक प्रकाश आता है।

मां ब्रम्हचारिणी, कुंडलिनी जागरण हेतु शक्ति प्रदान करती हैं। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।

माँ ब्रह्मचारिणी के इस स्वरुप का इतिहास अथवा रहस्य

पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया।

एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।

कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा “हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।”

माँ ब्रह्मचारिणी का अद्भुत चमत्कारिक मंदिर

मां ब्रह्मचारिणी का मंदिर Panchganga Ghat, Ghasi Tola, Varanasi, Uttar Pradesh में स्थित है। दुर्गा की पूजा के क्रम में ब्रह्मचारिणी देवी का दर्शन-पूजन बहुत महत्‍वपूर्ण माना गया है.

सुबह से ही लग जाती है भीड़

काशी के गंगा किनारे घाट पर स्थित मां ब्रह्मचारिणी के मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है. श्रद्धालु लाइन में लगकर मां का दर्शन प्राप्त करते हैं. श्रद्धालु मां के इस रूप का दर्शन करने के लिए नारियल, चुनरी, माला-फूल आदि लेकर श्रद्धा-भक्ति के साथ अपनी बारी आने का इंतजार करते हैं.

मां के दर्शन करने से मिलती है परब्रह्म की प्राप्ति

ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। जो देवी के इस रूप की आराधना करता है। उसे साक्षात परब्रह्म की प्राप्ति होती है। मां के दर्शन मात्र से श्रद्धालु को यश और कीर्ति प्राप्त होती है।

हर मनोकामना होती है पूरी

यहां ना सिर्फ काशी बल्कि अन्य जिलों से भी लोग दर्शन एवं पूजन के लिए आते हैं। नवरात्रि पर तो इस मंदिर में लाखों भक्त मां के दर्शन करने के लिए आते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां के इस रूप का दर्शन करने वालों को संतान सुख मिलता है। साथ ही वो भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं।

इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

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