जानिए श्राद्ध के प्रमुख स्थल,श्राद्ध और पितृ पक्ष की सम्पूर्ण जानकारी श्राद्ध और पितृ पक्ष सम्पूर्ण जानकारी

जानिए श्राद्ध के प्रमुख स्थल,श्राद्ध और पितृ पक्ष की सम्पूर्ण जानकारी .

सम्पूर्ण विज्ञान,रहस्य,महत्व,श्राद्ध का समय, श्राद्ध विधि, श्राद्ध के प्रकार एवं अन्य जरुरी तथ्य

श्राद्ध का विज्ञान -:

श्रीमद्भगवतगीता के दूसरे अध्याय के श्लोक बाइस – 22
में श्री कृष्ण भगवान जी श्री अर्जुन जी से कहते है कि

जैसे कोई व्यक्ति पुराने वस्त्रो को उतारकर नये वस्त्र पहनता है. वैसे ही शरीर धारण की हुई आत्मा पुराना अथवा जीर्ण (ख़राब) शरीर त्याग कर नया शरीर प्राप्त करती है।

शास्त्रों के अनुसार : जीवात्मा के शरीर छोड़ने से लेकर नया शरीर धारण करने तक जीवात्मा सूक्ष्म शरीर द्वारा कई पड़ाव तय करती है। जिसमे उसके पूर्व कर्मो के अनुसार समय लगता है। यह समय कितना होगा, कितने पड़ाव होंगे, ये सब उसके कर्मो पर निर्भर करता है।

उनमे एक पड़ाव पितृ रूप होता है, जिससे वह हमारे द्वारा किये गए उनके निमित सत्कर्मो को ग्रहण करती है और हमें शुभ आशीष देकर आगे की यात्रा तय करती है।
यह विषय बहुत ही बड़ा है और गहरा है।
बस इतना ध्यान दे की मृत्यु के बाद ये आत्मा सुक्ष्म शरीर द्वारा विचरण करती है जब तक वो अपने गंतव्य स्थान को प्राप्त न कर ले।

पितृ पक्ष किसे कहते है -:

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य का प्रवेश कन्या राशि में होता है तो उसी दौरान पितृ पक्ष मनाया जाता है, भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण की अमावस्या तक कुल 16 दिन तक श्राद्ध रहते हैं।

पितृ पक्ष का रहस्य -:

इन 16 दिनों के लिए हमारे पितृ सूक्ष्म रूप में हमारे घर में विराजमान होते हैं, पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान को सर्वोत्तम माना गया है.

श्राद्ध एवं पिंडदान किसे कहते है -:

श्रद्धा से किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है। अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण करना ही पिंडदान करना है।

श्राद्ध का महत्व -:

पितृ पक्ष के दौरान दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध किया जाता है। मान्यता है कि अगर पितर नाराज हो जाएं तो व्यक्ति का जीवन भी खुशहाल नहीं रहता और उसे कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यही नहीं घर में अशांति फैलती है और व्यापार व गृहस्थी में भी हानि झेलनी पड़ती है। ऐसे में पितरों को तृप्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध करना जरूरी माना जाता है।

श्राद्ध के जरिए पितरों की तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है और पिंड दान व तर्पण कर उनकी आत्मा की शांति की कामना की जाती है। श्राद्ध से जो भी कुछ देने का हम संकल्प लेते हैं, वह सब कुछ उन पूर्वजों को अवश्य प्राप्त होता है।

श्राद्धकर्म से पितृगण के साथ देवता भी तृप्त होते हैं। श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों के प्रति हमारा सम्मान है। इसी से पितृ ऋण भी चुकता होता है।

श्राद्ध कब तक करे -:

श्राद्ध कर्म करने से तीन पीढ़ियों के पूर्वजों को तर्पण किया जा सकता है। श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक होता है।

श्राद्ध कौन कर सकता है -:

पिता के श्राद्ध का अधिकार उसके पुत्र को ही है किन्तु जिस पिता के कई पुत्र हो उसका श्राद्ध उसके बड़े पुत्र, जिसके पुत्र न हो उसका श्राद्ध उसकी स्त्री, जिसके पत्नी नहीं हो, उसका श्राद्ध उसके सगे भाई, जिसके सगे भाई न हो, उसका श्राद्ध उसके दामाद या पुत्री के पुत्र (नाती) को और परिवार में कोई न होने पर उसने जिसे उत्तराधिकारी बनाया हो वह व्यक्ति उसका श्राद्ध कर सकता है। पूर्वजों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध शास्त्रों में बताए गए उचित समय पर करना ही फलदायी होता है।

श्राद्ध की तिथि -:

श्राद्ध करने के लिए सबसे पहले जिसके लिए श्राद्ध करना है उसकी तिथि का ज्ञान होना जरूरी है। जिस तिथि को मृत्यु हुई हो उसी तिथि को श्राद्ध करना चाहिए। लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति होती है कि हमें तिथि पता नहीं होती तो ऐसे में आश्विन अमावस्या का दिन श्राद्ध कर्म के लिए श्रेष्ठ होता है क्योंकि इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है।

पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष आरंभ होता है। प्रतिपदा तिथि पर नाना-नानी के परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो और मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो उसका श्राद्ध प्रतिपदा पर किया जाता है।

पंचमी तिथि पर अगर किसी अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु हुई है तो उसका श्राद्ध इस तिथि पर करना चाहिए।

अगर किसी महिला की मृत्यु हो गई है और मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है तो उसका श्राद्ध नवमी तिथि पर किया जाता है

एकादशी पर मृत संन्यासियों का श्राद्ध किया जाता है।

जिनकी मृत्यु किसी दुर्घटना में हो गई है, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि पर करना चाहिए।

सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या पर ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिए। जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।

एकादशी का श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ दान

विश्वविख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि श्राद्ध न किया जाए तो पितर गृहस्थ को दारुण शाप देकर पितृलोक लौट जाते है। एकादशी का श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ दान है। वह समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कराता है। उसके सम्पूर्ण पापकर्मों का विनाश हो जाता है तथा उसे निरंतर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

वहीं, द्वादशी तिथि के श्राद्ध से राष्ट्र का कल्याण तथा प्रचुर अन्न की प्राप्ति कही गई है। त्रयोदशी के श्राद्ध से संतति, बुद्धि, धारणाशक्ति, स्वतंत्रता, उत्तम पुष्टि, दीर्घायु तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।   

दिन का महत्व

जो पूर्णमासी के दिन श्राद्ध आदि करता है उसकी बुद्धि, पुष्टि, स्मरणशक्ति, धारणाशक्ति, पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती। वह पर्व का पूर्ण फल भोगता है। प्रतिपदा धन-सम्पत्ति के लिए होती है एवं श्राद्ध करने वाले की प्राप्त वस्तु नष्ट नहीं होती।

जो सप्तमी को श्राद्ध आदि करता है उसको महान यज्ञों के पुण्य फल प्राप्त होते हैं। अष्टमी को श्राद्ध करने वाला सम्पूर्ण समृद्धियां प्राप्त करता है। नवमी को श्राद्ध करने से ऐश्वर्य एवं मन के अनुसार अनुकूल चलने वाली स्त्री को प्राप्त करता है। दशमी तिथि का श्रद्धा मनुष्य ब्रह्मत्व की लक्ष्मी प्राप्त कराता है।

आइये जानते हैं शास्त्रों में बताया गया तर्पण और श्राद्धकर्म के लिए श्रेष्ठ समय क्या है:
पितृ शांति के लिए तर्पण का श्रेष्ठ समय संगवकाल यानी सुबह 8 से लेकर 11 बजे तक माना जाता है। इस दौरान किया गया जल से तर्पण पितरों को तृप्त करने के साथ पितृदोष और पितृऋण से मुक्ति भी देता है। इसी प्रकार शास्त्रों के अनुसार तर्पण के बाद बाकी श्राद्ध कर्म के लिए सबसे शुभ और फलदायी समय कुतपकाल होता है। ज्योतिष गणना के अनुसार यह समय हर तिथि पर सुबह 11.36 से दोपहर 12.24 तक होता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस समय सूर्य की रोशनी और ताप कम होने के साथ-साथ पश्चिमाभिमुख हो जाते है। ऐसी स्थिति में पितर अपने वंशजों द्वारा श्रद्धा से भोग लगाए कव्य बिना किसी कठिनाई के ग्रहण करते हैं।

श्राद्ध करने के लिए स्थान -:

श्राद्ध और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध हैं ये 5 तीर्थ स्थान, पुराणों में भी मिलता है इनका वर्णन…

उज्जैन (Ujjain) – यूं तो हमारे देश में श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण के लिए कई तीर्थ हैं, लेकिन उनमें से कुछ तीर्थ ऐसे भी हैं,जिनका वर्णन धर्म ग्रंथों में भी मिलता है। आज हम आपको श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण के लिए ऐसे ही प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों के बारे में बता रहे हैं –

  1. लोहागर ( राजस्थान) श्राद्ध कर्म करने के लिए यूं तो अनेक तीर्थ प्रसिद्ध हैं। उन्हीं में से एक तीर्थ ऐसा भी है जिसकी रक्षा स्वयं ब्रह्माजी करते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है। वह तीर्थ है- लोहागर। यह राजस्थान का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यह स्थान पिंडदान और अस्थि विसर्जन के लिए भी जाना जाता है। मान्यता के अनुसार, जिस व्यक्ति का श्राद्ध यहां किया जाता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां का मुख्य तीर्थ पर्वत से निकलने वाली सात धाराएं हैं। यहां के प्रधान देवता सूर्य हैं। लोहागर की परिक्रमा भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमीं तिथि से पूर्णिमा तक होती है।

2. गया (बिहार)
गया बिहार का दूसरा बड़ा शहर है। यह बिहार की सीमा से लगा फल्गु नदी के तट पर स्थित है। पितृ पक्ष के दौरान यहां रोज हजारों श्रद्धालु अपने पितरों का पिंडदान के लिये आते हैं। मान्यता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृतात्मा को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। इसलिए गया को श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान माना गया है। इस तीर्थ का वर्णन रामायण में भी मिलता है।

3. प्रयाग (उत्तर प्रदेश)
जैसे ग्रहों में सूर्य है, वैसे ही तीर्थों में प्रयाग सर्वोत्तम है। यहां श्राद्ध कर्म कराने की बड़ी मान्यता है। प्रयाग का मुख्य कर्म है, मुंडन और श्राद्ध। त्रिवेणी संगम के पास निश्चित स्थान पर मुंडन होता है। प्रयाग में श्राद्धकर्म प्रमुख रूप से संपन्न कराए जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जिस किसी भी पुण्यात्मा का तर्पण एवं अन्य श्राद्ध कर्म यहां विधि-विधान से संपन्न हो जाते हैं। वह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।…

4. ब्रह्मकपाल (उत्तराखंड)
ब्रह्मकपाल श्राद्ध कर्म के लिए पवित्र तीर्थ है। यहां पर तीर्थयात्री अपने पूर्वजों की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। यह स्थान बद्रीनाथ धाम के समीप स्थित है। धार्मिक मान्यता है कि ब्रह्मकपाल में श्राद्ध कर्म करने के बाद पूर्वजों की आत्माएं तृप्त होती हैं और उनको स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। इसके बाद कहीं भी पितृ श्राद्ध और पिंडदान करने की जरूरत नहीं होती। इस तीर्थ के समीप ही अलकनंदा नदी बहती है। किवदंती यह भी है कि पांडवों ने भी यहां अपने परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया था।

5. पिण्डारक (गुजरात)
इस क्षेत्र का प्राचीन नाम पिण्डतारक है। यह स्थान गुजरात में स्थित द्वारिका से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। यहां एक सरोवर है। सरोवर के तट पर यात्री श्राद्ध करके दिए हुए पिंड सरोवर में डाल देते हैं। यहां कपालमोचन महादेव, मोटेश्वर महादेव और ब्रह्माजी के मंदिर हैं। साथ ही श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक भी है। प्राचीन मान्यता है कि किसी समय यहां महर्षि दुर्वासा का आश्रम था। प्राचीन मान्यता है कि किसी समय यहां महर्षि दुर्वासा का आश्रम था। महर्षि दुर्वासा के वरदान के कारण ही इस स्थान पर पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है।

वैसे तो श्राद्ध कर्म किसी पावन तीर्थ स्थल में , पवित्र नदी अथवा किसी सरोवर के किनारे पर ही करना चाहिए लेकिन शास्त्र अनुसार सामर्थ्य न होने पर घर पर भी श्राद्ध कर्म किया जा सकता है जिसका वर्णन मेने श्राद्ध विधि में किया है।

आइये अब यह जानते है की किस विधि से या कैसे करे श्राद्ध:

  • जिस तिथि को आपको घर मे श्राद्ध करना हो उस दिन प्रात: काल जल्दी उठ कर स्नान आदि से निवर्त हो जाये| पितरो के निम्मित भगवन सूर्य देव को जल अर्पण करे और अपने नित्य नियम की पूजा करके अपने रसोई घर की शुद्ध जल से साफ़ सफाई करे और पितरो की सुरुचि यानि उनके पसंद का स्वादिष्ट भोजन बनाये भोजन को एक थाली मे रख ले और पञ्च बलि के लिए पांच जगह 2-2  पुड़ी या रोटी जो भी आपने बनायीं है उस पर थोड़ी सी खीर रख कर पञ्च पत्तलों पर रख ले|
  • एक उपला यानि गाय के गोबर का कंडे को गरम करके किसी पात्र मे रख दे| अब आप अपने घर की दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके बैठ जाये| अपने सामने अपने पितरो की तस्वीर को एक चोकी पर स्थापित कर दे| एक महत्वपूर्ण बात जो है कि पितरो की पूजा मे रोली और चावल वर्जित है। रोली रजोगुणी होने के कारण पितरों को नहीं चढ़ती, चंदन सतोगुणी होता है अतः भगवान शिव की तरह पितरों को भी चन्दन अर्पण किया जाता है।
  • इसके अलावा पितरों को सफेद फूल चढ़ाए जाते हैं तो आप भी अपने पितरो को चन्दन का टिका लगाये और सफ़ेद पुष्प अर्पण करे| उनके समक्ष 2 अगरबत्ती और शुद्ध घी का दीपक जलाये| हाथ जोड़ कर अपने पितरो से प्रार्थना करे और जाने अनजाने मे हुई गलती के लिए माफ़ी मांगे| अपने घर की सुख शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगे और उन्हें भोजन का निमंत्रण दे| भोजन की थाली और पांच जगह जो आपने पितरो की बलि रखी है उसे पितरो की तस्वीर के सामने रख दे|
  • गरम उपला यानि कंडे पर आप शुद्ध घी और भोजन की थाली मे से थोडा-थोडा समस्त पकवानों को लेकर शुद्ध घी मे मिलाकर उपले (कंडे ) पर अपने पितरो को भोग अर्पण करे जिसे हम धूप भी कहते है| मुख्य बात यह ध्यान रखने की है कि जब तक आप इस प्रकार अपने पितरो को इस प्रकार धूप नहीं देंगे तब तक आपके घर के पितृ देवता भोजन ग्रहण नहीं करते है| उस धुप से उठने वाली सुगंध से ही वो भोजन को ग्रहण करते है| धूप देने के बाद अपने सीधे हाथ मे जल लेकर भोजन की थाली के चारो और तीन भर घुमा कर अगुठे की तरफ से जल जमीन पर छोड़ दे|
  • श्राद्ध में श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए। इस पाठ का फल आत्मा को समर्पित करना चाहिए।
  • आप मे से बहुत से दर्शक ऐसे होंगे जीने यह नहीं पता होगा कि जब हम अंगुलियों की तरफ से जल छोड़ते है तो वो जल देवता ग्रहण करते है और जब हम अंगूठे की तरफ से जल छोड़ते है तो वह जल आपके पितृ ग्रहण करते है| बहुत छोटी सी किन्तु आपक सभी के लिए बहुत ज्ञानवर्धक बात है यह| तो अगर आप चाहते है ही आपके पितृ आपका दिया हुआ भोजन और जल ग्रहण करे तो इस विधि से धुप दे और जल को अंगूठे की तरफ से छोड़े| एक बार पुन: उनसे मंगल आशीर्वाद की कामना करे|
  • पांच बलि मे से एक एक बलि क्रमश गाय को, कुत्ते को, कौए को, एक किसी भी मांगने वाले को और एक चींटी को दे दे| भोजन की थाली घर मे बुलाये ब्राह्मिन के सामने रखे| उसे आत्मीयता से भोजन करवाए . भोजन के पश्चात ब्राह्मिन देवता के चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त करे और ब्राह्मिन देवता को यथा शक्ति दक्षिणा, वस्त्र आदि दे कर विदा करे|

पितृ पक्ष में ध्यान देने योग्य बाते -:

श्राद्ध के 16 दिनों में अष्टमुखी रुद्राक्ष धारण करें। इन दिनों में घर में 16 या 21 मोर के पंख अवश्य लाकर रखें। शिवलिंग पर जल मिश्रित दुग्ध अर्पित करें। घर में प्रतिदिन खीर बनाएं। भोजन में से सर्वप्रथम गाय, कुत्ते और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालें। माना जाता है कि यह सभी जीव यम के काफी निकट हैं। श्राद्ध पक्ष में व्यसनों से दूर रहें। पवित्र रहकर ही श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य भी वर्जित माने गए हैं। श्राद्ध का समय दोपहर में उपयुक्त माना गया है। रात्रि में श्राद्ध नहीं किया जाता। श्राद्ध के भोजन में बेसन का प्रयोग वर्जित है। श्राद्ध कर्म में लोहे या स्टील के पात्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पितृदोष जब शांत हो जाता है तो स्वास्थ्य, परिवार और धन से जुड़ी बाधाएं भी दूर हो जाती हैं।

पितृदेव को प्रसन्न करने करें ये 12 श्राद्ध -:

  1. नित्य श्राद्ध- पितृपक्ष में रोज किए जाने वाले श्राद्ध को नित्य श्राद्ध कहते हैं. इसमें लोग अपने पितरों को प्रतिदिन जल, अन्न, दूध, काले तिल और कुश से श्राद्ध देते हैं. मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है.

2. नैमित्तिक श्राद्ध– यह श्राद्ध पितृ ऋण से मुक्ति के लिए किया जाता है. यदि जातक के माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है तो उन्हें एकोदिष्ट श्राद्ध दिया जाता है.

3. काम्य श्राद्ध- अगर जातक के मन में कोई कामना या सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा है तो वो यह श्राद्ध करता है.

4. वृद्धि श्राद्ध- यदि जातक में वृद्धि की कामना यानी कि परिवार वृद्धि, यश वृद्धि की कामना है तो इसके लिए वृद्धि श्राद्ध किया जाता है.

5. सपिंडन श्राद्ध- यह श्राद्ध प्रेत, पितरों की आत्माओं मृत व्यक्तियों को 12वें दिन किया जाता है. इस श्राद्ध को पुरुष और महिलाएं दोनों कर सकते हैं.

6. पार्वण श्राद्ध- यह श्राद्ध अमावस्या के विधान के अनुसार किया जाता है. इसलिए इसे पार्वण श्राद्ध की संज्ञा दी गई है.

7. गोष्ठी श्राद्ध- जब श्राद्ध के लिए परिवार के सभी सदस्य तर्पण दें तब उसे गोष्ठी श्राद्ध कहा जाता है.

8. शुद्धयर्थ श्राद्ध- यह श्राद्ध पितृपक्ष में किया जाता है. मान्यताओं के अनुसार, यह श्राद्ध परिवार में शुद्धता बरक़रार रखने के लिए किया जाता है.

9. कर्मांग श्राद्ध- घर में किसी संस्कार समारोह के दौरान जो श्राद्ध किया जाता है उसे कर्मांग श्राद्ध कहा जाता है.

10. तीर्थ श्राद्ध- किसी तीर्थ स्थल पर जाकर पूर्वजों को तर्पण देने को तीर्थ श्राद्ध कहा जाता है. लोग गया जी में तीर्थ श्राद्ध करते हैं.

11. यात्रार्थ श्राद्ध- अगर आपके मन में कोई इच्छित यात्रा है और आप उसमें सफल होना चाहते हैं तो यात्रार्थ श्राद्ध किया जाता है.

12. पुष्टयर्थ श्राद्ध- जातक यदि धन, यश और वृद्धि की कामना के साथ श्राद्ध कर्म करता है तो उसे पुष्टयर्थ श्राद्ध कहा जाता है. बता दें कि सात से बारहवें प्रकार के -श्राद्ध एक ही तरह से किए जाते हैं.

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और अगली आने वाली पोस्ट को बेहतर बनाने के लिए। आप अपने सुझाव जरूर दे

धन्यवाद

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